कई नए ट्रेडर्स सोचते हैं कि F&O मुनाफ़े पर शेयरों की तरह शॉर्ट-टर्म या लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगेगा। ऐसा नहीं है। मान्यता प्राप्त एक्सचेंज पर ट्रेड हुए Futures और Options से हुआ मुनाफ़ा और नुकसान बिज़नेस इनकम माना जाता है। यही एक बात टैक्स रेट, रिटर्न फॉर्म, क्लेम होने वाले खर्च और नुकसान के साथ क्या होगा, सब तय करती है।
सामान्य जानकारी, टैक्स सलाह नहीं
यह लेख शिक्षा के लिए नियमों को सामान्य रूप में समझाता है। यह टैक्स सलाह नहीं है और हो सकता है आपकी स्थिति पर लागू न हो। टैक्स कानून और ड्यू डेट बदलते रहते हैं, और Income-tax Act, 2025 नया है, इसलिए कुछ बातों की व्याख्या अभी तय हो रही है। रिटर्न फाइल करने या कोई फ़ैसला लेने से पहले किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट से सलाह लें।
बिज़नेस इनकम, स्पेक्युलेटिव नहीं
भारतीय टैक्स कानून स्पेक्युलेटिव बिज़नेस, जैसे शेयरों में इंट्राडे ट्रेडिंग जिसमें डिलीवरी नहीं ली जाती, को सामान्य बिज़नेस से अलग रखता है। Income-tax Act, 1961 में एक्सचेंज पर ट्रेड होने वाले डेरिवेटिव को खास तौर पर स्पेक्युलेटिव कैटेगरी से बाहर रखा गया था, इसलिए F&O नॉन-स्पेक्युलेटिव बिज़नेस इनकम है। Income-tax Act, 2025, जो टैक्स वर्ष 2026-27 (1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2027) से लागू है, वही व्यवस्था बनाए रखता है।
नॉन-स्पेक्युलेटिव होना मुख्य रूप से नुकसान के लिए मायने रखता है। F&O नुकसान को उसी साल की ज़्यादातर दूसरी इनकम से सेट-ऑफ किया जा सकता है और आठ साल तक कैरी फॉरवर्ड किया जा सकता है, जबकि स्पेक्युलेटिव नुकसान सिर्फ़ स्पेक्युलेटिव इनकम से ही सेट-ऑफ हो सकता है। नुकसान वाले लेख में इसकी पूरी जानकारी है।
आपके स्लैब रेट पर टैक्स
F&O के लिए कोई खास फ्लैट रेट नहीं है। खर्च घटाने के बाद आपका नेट F&O मुनाफ़ा आपकी दूसरी इनकम (सैलरी, ब्याज, किराया) में जोड़ा जाता है और कुल रकम पर आपके स्लैब रेट से टैक्स लगता है। Union Budget 2026 ने स्लैब नहीं बदले। नई टैक्स रिजीम में, जो डिफ़ॉल्ट है, टैक्स वर्ष 2026-27 के स्लैब ये हैं:
| कुल इनकम | रेट (नई रिजीम) |
|---|---|
| ₹4 लाख तक | शून्य |
| ₹4 लाख से ₹8 लाख | 5% |
| ₹8 लाख से ₹12 लाख | 10% |
| ₹12 लाख से ₹16 लाख | 15% |
| ₹16 लाख से ₹20 लाख | 20% |
| ₹20 लाख से ₹24 लाख | 25% |
| ₹24 लाख से ज़्यादा | 30% |
F&O मुनाफ़े पर सामान्य स्लैब रेट से टैक्स लगता है, इसलिए नई रिजीम की रिबेट में इसे आमतौर पर सैलरी की तरह ही गिना जाता है। जिस इनकम पर स्पेशल रेट से टैक्स लगता है, जैसे कुछ कैपिटल गेन, उसका हिसाब अलग है। आपके केस में किस रिजीम में टैक्स कम बनेगा, यह आपका CA बता सकता है।
कौन-से खर्च घटा सकते हैं
बिज़नेस इनकम होने के कारण F&O मुनाफ़ा उन खर्चों को घटाकर निकाला जाता है जो पूरी तरह ट्रेडिंग के लिए किए गए हों। आमतौर पर माने जाने वाले खर्च:
- ब्रोकरेज, एक्सचेंज ट्रांज़ैक्शन चार्ज, SEBI फीस, स्टैम्प ड्यूटी और इन चार्ज पर GST।
- सिक्योरिटीज़ ट्रांज़ैक्शन टैक्स (STT)। जब ट्रेडिंग इनकम बिज़नेस इनकम के रूप में दिखाई जाए, तो यह घटता है, और F&O इनकम ऐसी ही है। इसलिए Budget 2026 में F&O पर STT की बढ़ोतरी (1 अप्रैल 2026 से Futures पर 0.05% और Options Premium पर 0.15%) आपकी लागत बढ़ाती है, लेकिन आपका डिडक्शन भी बढ़ाती है।
- इंटरनेट और फोन बिल, उतने हिस्से में जितना असल में ट्रेडिंग के लिए इस्तेमाल हुआ।
- ट्रेडिंग के लिए इस्तेमाल होने वाली चार्टिंग, डेटा और रिसर्च सर्विस के सब्सक्रिप्शन।
- ट्रेडिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले कंप्यूटर या दूसरे उपकरण पर डेप्रिसिएशन, एक ही साल में पूरी कीमत नहीं।
- ट्रेडिंग के लिए उधार लिए पैसे पर ब्याज, और आपके ट्रेडिंग अकाउंट्स व ऑडिट के लिए चार्टर्ड अकाउंटेंट को दी गई फीस।
इनवॉइस और बैंक रिकॉर्ड संभालकर रखें। जो खर्च निजी है, या जिसे आप ट्रेडिंग बिज़नेस से नहीं जोड़ सकते, वह आमतौर पर अमान्य हो जाता है। एक व्यक्ति को एक दिन में कानूनी सीमा से ज़्यादा नकद भुगतान भी डिडक्शन के रूप में नहीं मिलता।
प्रेज़म्प्टिव टैक्सेशन: आमतौर पर ठीक नहीं बैठता
छोटे बिज़नेस प्रेज़म्प्टिव टैक्सेशन चुन सकते हैं (पहले सेक्शन 44AD, अब 2025 Act का सेक्शन 58)। पूरे अकाउंट रखने की जगह आप बैंकिंग चैनल से मिले टर्नओवर का कम से कम 6% मुनाफ़े के रूप में घोषित करते हैं, बशर्ते टर्नओवर ₹2 करोड़ के अंदर हो, या नकद प्राप्ति 5% से ज़्यादा न हो तो ₹3 करोड़ के अंदर। कुछ ट्रेडर्स इसे इस्तेमाल करते हैं और ITR-4 फाइल करते हैं।
ज़्यादातर F&O ट्रेडर्स के लिए यह ठीक नहीं बैठता। F&O टर्नओवर मुनाफ़े और नुकसान की एब्सोल्यूट रकमों का जोड़ होता है, इसलिए इसका 6% आपकी असली कमाई से ज़्यादा हो सकता है। इस स्कीम में आप असली खर्च क्लेम नहीं कर सकते और नुकसान दर्ज नहीं कर सकते, और इससे बाहर निकलने पर पांच साल तक दोबारा इसमें आने से रोका जा सकता है और ऑडिट की शर्तें लग सकती हैं। जो लोग 6% से कम घोषित करते हैं, उनके साथ नया Act कैसा बर्ताव करेगा, इस पर जानकारों की राय भी अलग-अलग है (ऑडिट वाला लेख देखें)।
बाकी कंप्लायंस की तस्वीर
- टर्नओवर ट्रेड किए गए कॉन्ट्रैक्ट की वैल्यू नहीं है। यह ICAI के तरीके से निकाला जाता है और इसी से तय होता है कि आपको ऑडिट चाहिए या नहीं।
- जिन ट्रेडर्स के कम से कम 95% लेन-देन नकद के बिना होते हैं, उनके लिए ₹10 करोड़ से ज़्यादा टर्नओवर पर टैक्स ऑडिट ज़रूरी है, और कम मुनाफ़े वाले कुछ मामलों में भी।
- F&O के लिए रिटर्न फॉर्म आमतौर पर ITR-3 होता है, जिसमें प्रॉफ़िट एंड लॉस अकाउंट और बैलेंस शीट चाहिए।
- अगर TDS के बाद साल का कुल टैक्स ₹10,000 या उससे ज़्यादा है, तो आपसे चार किस्तों में एडवांस टैक्स भरने की उम्मीद की जाती है।
- नुकसान तभी कैरी फॉरवर्ड होता है जब आप रिटर्न ड्यू डेट तक फाइल करें।
उदाहरणों में दी गई रकम सिर्फ़ समझाने के लिए है, यह मौजूदा मार्केट डेटा नहीं है। यह सामान्य शिक्षा है, निवेश सलाह नहीं।